कुशीनगर। जिस जन्माष्टमी को कुशीनगर पुलिस 32 साल से अशुभ मानकर नहीं मनाती थी, अब वही त्योहार दो साल से खुशी का प्रतीक बन गया है। पचरूखिया एनकाउंटर की काली याद के कारण जिले की पुलिस ने कृष्ण जन्मोत्सव मनाना छोड़ दिया था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। एसपी केशव कुमार की पहल पर इस बार पुलिस लाइन से लेकर हर थाने में जन्माष्टमी की भव्य तैयारी है। कई थानों में एक दिन पहले से ही मानस पाठ शुरू करा दिया गया है।
इस नई परंपरा की नींव पिछले साल पड़ी थी, जब तत्कालीन एसपी संतोष कुमार मिश्रा ने थानों में फिर से पूजा-पाठ और जन्मोत्सव मनाने को कहा था।
क्या था पचरूखिया कांड?
13 मई 1994 को कुशीनगर नया जिला बना था। पहला ही त्योहार जन्माष्टमी था, जिसके लिए पुलिस लाइन में सजावट हो रही थी। तभी 29 अगस्त 1994 को पडरौना कोतवाली को खबर मिली कि बिहार-UP में आतंक का पर्याय बने जंगल पार्टी के सरगना बेचू मास्टर और उसका साथी रामप्यारे प्रधान राधाकृष्ण गुप्त के घर बड़ी वारदात करने वाले हैं।
सूचना पर तत्कालीन एसपी बुद्धचंद ने दो टीमें बनाईं। एक का नेतृत्व सीओ पडरौना आरपी सिंह कर रहे थे, दूसरी टीम तरयासुजान के थानेदार अनिल पांडेय के साथ थी। दोनों टीमें रात में बांसी नदी के घाट पर पहुंचीं। डकैत नदी के पार पचरूखिया गांव में छिपे थे। गांव के मल्लाह भुखल की छोटी डोंगी से जवानों को पार कराया जा रहा था।
पहली टुकड़ी तो पार हो गई, लेकिन जैसे ही दूसरी डोंगी बीच धार में पहुंची, किनारे पर घात लगाए डकैतों ने बम फेंके और गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। हमले में मल्लाह और एक सिपाही घायल हो गए, डोंगी पलट गई और उस पर सवार सभी जवान नदी में गिर गए। डकैत देर तक फायरिंग करते रहे।
अगले दिन चले सर्च ऑपरेशन में छह जवानों के शव मिले – थानेदार अनिल पांडेय, कुबेरस्थान थानेदार राजेंद्र यादव, सिपाही नागेंद्र पांडेय, खेदन सिंह, विश्वनाथ यादव और परशुराम गुप्त। मल्लाह भुखल भी शहीद हो गया। चार पुलिसकर्मी किसी तरह बच गए थे। इस घटना के बाद से ही पुलिस ने जन्माष्टमी मनाना बंद कर दिया था, जिसे अब फिर से शुरू किया गया है।