प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर मंगलवार को कड़ा रुख अपनाया। जस्टिस समीर जैन की बेंच के सामने पेश हुए DGP राजीव कृष्ण से अदालत ने पूछा कि जब पुलिस को न्यायालय के निर्देशों पर समय से कार्रवाई करनी होती है, तो उनके पालन में लगातार देरी क्यों हो रही है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साफ कर दिया कि आंकड़ों से ज्यादा जरूरी यह है कि जांच कितनी गंभीरता और सही तरीके से की जा रही है।
ये है मामला
DGP ने अदालत को पुलिस विभाग की ओर से उठाए गए कदमों की जानकारी दी। उन्होंने समस्याओं पर निगरानी और सुधार के लिए समितियां गठित किए जाने की बात कही। साथ ही प्रदेश में दोषसिद्धि की दर का भी उल्लेख किया। इस पर कोर्ट ने कहा कि उसके सामने मुद्दा कन्विक्शन रेट नहीं है। अदालत उन मामलों से जूझ रही है, जहां जांच में कमियां रह जाती हैं और जरूरी रिकॉर्ड समय पर उपलब्ध नहीं कराया जाता।
बेंच ने सीसीटीवी फुटेज और जांच से संबंधित दस्तावेज अदालत में पेश करने में हुई देरी पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि अब पुलिस को तीन दिन के भीतर आवश्यक निर्देश दाखिल करने होंगे। अदालत की चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जांच से जुड़े दस्तावेज समय पर न मिलने से गंभीर आपराधिक मामलों में न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है और जमानत याचिकाओं की सुनवाई भी लंबी हो सकती है।
मामला पुष्पराज सिंह उर्फ बबलू की जमानत याचिका से जुड़ा है। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने राज्य से 21 जून 2025 की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग में दर्ज समय और घटना के कथित समय के बीच अंतर को लेकर विस्तृत जवाब मांगा था। इसके लिए 16 जुलाई 2026 को निर्देश जारी हुए थे, लेकिन जवाब दाखिल नहीं किया गया।
वकील ने बताया ये
सरकारी वकील डॉ. एसबी मौर्य ने बताया था कि संबंधित अधिकारियों को दो बार पत्र भेजे गए थे। इसके बावजूद हलफनामा अदालत में नहीं पहुंचा। इसी को लेकर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए इसे अदालत के आदेश की अवहेलना माना था और DGP को खुद उपस्थित होकर स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया था।