उत्तर प्रदेश में बीते दो वर्षों के दौरान एक लाख से अधिक लोगों के लापता होने के मामलों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच को गंभीर चिंता में डाल दिया है। इस मामले में सख़्त रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और अपर मुख्य सचिव (गृह) को तलब किया है।
ये है मामला
गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इतने बड़े पैमाने पर गुमशुदगी के मामलों में पुलिस की कार्रवाई बेहद असंतोषजनक है। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई के दौरान डीजीपी और अपर मुख्य सचिव गृह को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर पूरे रिकॉर्ड और आंकड़ों के साथ जवाब देना होगा।
सरकारी हलफनामे में सामने आए आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 1 जनवरी 2024 से 18 जनवरी 2026 के बीच प्रदेश में कुल 1,08,300 लोग लापता हुए, जिनमें से केवल 9,700 लोगों का ही अब तक पता लगाया जा सका। कोर्ट ने इन आंकड़ों को “बेहद गंभीर और चिंताजनक” करार दिया।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि गुमशुदा लोगों के मामलों में संबंधित अधिकारियों का रवैया लापरवाही और हीला-हवाली को दर्शाता है। इसी के चलते कोर्ट ने इस पूरे मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया है।
23 मार्च को होगी सुनवाई
यह मामला लखनऊ के चिनहट निवासी एक याची की याचिका से जुड़ा है, जिनका बेटा जुलाई 2024 में लापता हो गया था। स्थानीय थाने में गुमशुदगी दर्ज होने के बावजूद पुलिस की कार्रवाई प्रभावी नहीं रही, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा।
अब 23 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं, जहां डीजीपी को यह बताना होगा कि प्रदेश में लापता लोगों की तलाश के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए और आगे की क्या रणनीति है।