गाज़ियाबाद में तैनात उत्तर प्रदेश पुलिस की सब-इंस्पेक्टर अस्मिता डे ने अपनी मेहनत और जज्बे से देश का नाम रोशन कर दिया है। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में अस्मिता ने महिलाओं के 48 किलोग्राम जूडो वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। यह जीत सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग और कभी हार न मानने वाली कहानी है।
साधारण परिस्थितियों में बीता बचपन
दक्षिण त्रिपुरा के बेलोनिया में 22 मार्च 2003 को जन्मी अस्मिता का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। उनका परिवार मिट्टी के एक छोटे से घर में रहता था। पिता अर्जुन डे साइकिल मरम्मत की छोटी दुकान चलाते थे और परिवार का गुजारा करीब 300 रुपये रोज की कमाई से होता था। आर्थिक परेशानियों के बावजूद पिता ने बेटी के सपनों को हमेशा आगे बढ़ाया।
दिसंबर 2025 में ब्रेन स्ट्रोक के कारण पिता के निधन ने अस्मिता को अंदर तक तोड़ दिया। कॉमनवेल्थ गेम्स के चयन ट्रायल से ठीक पहले हुई इस घटना के बाद उन्होंने खेल छोड़ने तक का मन बना लिया था। लेकिन उनकी मां ने उनका हौसला बढ़ाया और कहा कि अगर वह अब खेल छोड़ देंगी तो यह उनके पिता के सपनों को अधूरा छोड़ने जैसा होगा। मां की बातों ने अस्मिता को फिर से खड़ा किया और उन्होंने भोपाल स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) केंद्र में कड़ी मेहनत शुरू कर दी।
एथलेटिक्स से शुरू हुआ था सफर
अस्मिता ने अपने खेल करियर की शुरुआत जूडो से नहीं, बल्कि 800 मीटर दौड़ से की थी। वह एथलेटिक्स में अच्छा प्रदर्शन कर रही थीं और जिला स्तर के ट्रायल तक पहुंची थीं। बाद में एक कोच की सलाह पर उन्होंने जूडो को अपना खेल बनाया।
स्कूल गेम्स और खेलो इंडिया सर्किट में शानदार प्रदर्शन के बाद साल 2018 में उनका चयन भोपाल स्थित SAI क्षेत्रीय केंद्र के लिए हुआ। यहां उन्होंने कोच यशपाल सोलंकी के मार्गदर्शन में अपनी तकनीक और खेल कौशल को बेहतर बनाया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिखाया दम
अस्मिता ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। साल 2022 में थाईलैंड में आयोजित एशियन कैडेट एंड जूनियर जूडो चैंपियनशिप में पदक जीतकर वह त्रिपुरा की पहली अंतरराष्ट्रीय जूडो पदक विजेता बनीं।
इसके बाद साल 2023 में उन्होंने मकाऊ में आयोजित जूनियर एशिया कप में स्वर्ण पदक और कुवैत में एशियन ओपन में रजत पदक हासिल किया। साल 2025 में मोरक्को के कासाब्लांका अफ्रीकन ओपन में उन्होंने अपना पहला सीनियर अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीता।
आज अस्मिता डे उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। मिट्टी के घर से निकलकर कॉमनवेल्थ गेम्स के स्वर्ण पदक तक का उनका सफर लाखों खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बन गया है। उनका संघर्ष यह साबित करता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, मेहनत और हौसले से बड़े से बड़ा सपना पूरा किया जा सकता है।