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Happy Birthday UP STF : 90 के दशक में डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला की गिरफ्तारी के लिए आज के ही दिन हुआ था एसटीएफ का गठन

Happy Birthday UP STF : 90 के दशक में डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला की गिरफ्तारी के लिए आज के ही दिन हुआ था एसटीएफ का गठन

उत्तर प्रदेश पुलिस का सबसे अहम हिस्सा STF (स्पेशल टास्क फोर्स) को आज 24 साल पूरे हो गए है। जी हां आज के ही दिन 4 मई 1998 को यूपी एसटीएफ का गठन उस समय किया गया था जब उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध के खात्मे के लिए बड़ा कदम उठाना 90 के दशक में उस समय बेहद जरूरी हो गया था। जिस समय एक डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला हुआ करता था, जिसकी अपराधिक वारदाते अखबारों  के पन्ने की सुर्खियों में रंगे होते थे। यूपी में 21 सितंबर 1997 को भारतीय जनता पार्टी जीत हांसिल कर वर्चस्व में आई थी। कल्याण सिंह जी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद से ही उन्होंने अपराधियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया था।

श्रीप्रकाश शुक्ला ने कल्याण सिंह को मारने की ही ले डाली थी सुपारी

इस दौरान श्रीप्रकाश शुक्ला ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मारने की सुपारी ली थी। कल्याण सिंह के निर्देश से 4 मई 1998 को एसटीएफ यानी स्पेशल टास्क फोर्स का गठन हुआ। उन्होंने एसटीएफ को टास्क दिया कि वह दुर्दांत अपराधियों से उत्तर प्रदेश को मुक्ति दिलाए। यूपी एसटीएफ (स्पेशल टास्क फोर्स) ने अपने पहले ऑपरेशन में 22 सितंबर 1998 को गाजियाबाद में हुए मुठभेड़ में श्रीप्रकाश शुक्ला को मार गिराया। उसके बाद एसटीएफ ने इस तरह के कई ऑपरेशंस को अंजाम तक पहुंचाया।

यूपी में आज तक नहीं रहा कोई ऐसा डॉन

कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की धरती पर यूं तो कई बाहुलबलियों का दबदबा रहा है, लेकिन आज तक कोई भी माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला का रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाया। 90 के दशक में डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम से ही लोग थरथर कांप उठते थे। 90 के दशक में शुक्ला का आतंक इस कदर बड़ चुका था कि उसकी धरपकड़ के लिए ही स्पेशल टॉस्क फोर्स यानी STF का गठन करना पड़ा था। गौरतलब है कि श्रीप्रकाश के एनकाउंटर को 30 से ज्यादा का समय हो चुका हैं लेकिन जो दहशत शुक्ला की थी वो आज तक कायम है।

यूपी पुलिस के लिए 90 का दशक रहा चुनौती भरा

90 के दशक में जरायम की दुनिया में श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम की तूती बोलती थी। क्या पुलिस और क्या नेता और आमजनमानस सभी शुक्ला के नाम का खौफ खाते थे। आलम यह था कि श्री प्रकाश शुक्ला ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मारने तक की सुपारी ली थी। श्रीप्रकाश द्वारा ताबड़तोड़ अपराध सरकार और पुलिस के लिए चुनौती के साथ-साथ बड़ा सिरदर्द बन चुके थे। जिसके खात्मे के लिए उत्तर प्रदेश के डीजीपी (DGP) ने स्पेशल टास्क फ़ोर्स (STF) का गठन किया था।

फोर्स का पहला टास्क था श्रीप्रकाश शुक्ला को जिंदा या मुर्दा

4 मई 1998 को UP POLICE के तत्‍कालीन ADG अजयराज शर्मा ने राज्य पुलिस के ही 50 बेहतरीन अधिकारियों को छांट कर स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) का गठन किया। इस फोर्स का पहला टास्क था श्रीप्रकाश शुक्ला को जिंदा या मुर्दा बरामद करना था। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यूपी पुलिस के लिए यह रही थी कि, प्रशासन के पास शुक्ला की कोई तस्वीर ही उपलब्ध नहीं थी। कहा जाता है कि जो तस्वीर मीडिया में सर्कुलेट की गई, उसमें चेहरा तो श्रीप्रकाश शुक्ला का है, और शरीर बॉलिवुड अभिनेता सुनील शेट्टी का जोड दिया गया था। सादी वर्दी में तैनात एके-47 से लैस एसटीएफ के जवानों ने लखनऊ से गाजियाबाद, गाजियाबाद से बिहार, कलकत्ता, जयपुर तक छापेमारी की तब जाकर श्रीप्रकाश शुक्‍ला की तस्‍वीर पुलिस के हाथ लगी थी। ।

श्रीप्रकाश शुक्ला की कहानी ऐसे हुआ अंत

दरअसल जिस समय श्रीप्रकाश शुक्ला पूरी तरह से यूपी पुलिस की रडार पर आ चुका था, ठीक उसी समय वह अंडरग्राउंड हो गए औक खुद को रेलवे ठेके से दूर कर लिया। शुक्ला के लिए हत्या, अपहरण, फिरौती आम बात थी। श्रीप्रकाश शुक्ला का खौफ व अपराधिक वारदातों का घड़ा लबा लब हो चुका था। इसी दौरान 23 सितंबर 1998 को एसटीएफ को किसी मुखबिर द्वारा गुप्त सूचना मिली थी कि श्री प्रकाश शुक्‍ला दिल्‍ली से गाजियाबाद की तरफ आ रहा है। सूचना मिलते ही यूपी एसटीएफ ने अरनी कमर कसते हुए मुस्तैदी से उसकी तलाश की, इसी दौरान पीछा कर रही एसटीएफ की टीम ने अचानक श्रीप्रकाश की कार को ओवरटेक कर उसका रास्ता रोक दिया था। पुलिस ने पहले श्रीप्रकाश को आत्मसमर्पण करने के लिए भी कहा था लेकिन वो नहीं माना और फायरिंग शुरू कर दी, तो पुलिस की जवाबी फायरिंग में श्रीप्रकाश शुक्ला मारा गया और इस तरह से यूपी के सबसे बड़े डॉन की कहानी खत्म हुई। लेकिन शुक्ला के नाम का खौफ आज भी कायम है।

पूर्व डीजीपी व भाजपा नेता बृजलाल के मुताबिक

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी और भाजपा नेता बृजलाल के मुताबिक एसटीएफ ने श्रीप्रकाश शुक्ला के खात्मे के बाद निर्भय गुर्जर, ददुआ, ठोकिया जैसे तमाम अपराधियों को ढेर कर बड़ी उपलब्धियां हांसिल की है। जिसमें अपराध पर लगाम लगाने की दिशा में पूर्व सीएम कल्याण सिंह की बड़ी भूमिका रही। पुलिस सुधारों को लेकर मुखर रहने वाले एक अन्य पूर्व डीजीपी सिं​ह का कहना है कि उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध और माफिया के खिलाफ दो ही सरकारों में कार्रवाई हुई है। एक कल्याण सिंह की सरकार में और दूसरा योगी आदित्यनाथ की सरकार में।

कैसे काम करती है यूपी STF

एसटीएफ का नेतृत्व एक अतिरिक्त महानिदेशक रैंक (ADG) का अधिकारी करता है, जिसकी सहायता पुलिस महानिरीक्षक (IG) करता है। एसटीएफ टीमों के रूप में काम करती है, जिसमें प्रत्येक टीम डिप्टी एसपी के अतिरिक्त एसपी के नेतृत्व में होती है। एसटीएफ द्वारा संचालित सभी अभियानों के प्रभारी एसएसपी होते हैं। स्पेशल टास्क फोर्स के पास पूरे यूपी का क्षेत्राधिकार है। सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं संबंधित राज्य पुलिस की सहायता से इसकी टीमें राज्य के बाहर भी काम करती हैं। यूपी एसटीएफ अपने लीड तक पहुंचने के लिए आसपास के खुफिया तंत्र का सहारा लेती है, जिसमें कई तरह के लोग होते हैं। इसके अलावा टास्क फोर्स सर्विलांस जैसी तकनीके और एक पूरी फुलप्रूफ रणनीत‍ि पर काफी निर्भर रहता है

ये है पूरी कहानी

डीआईजी राजेश कुमार पांडेय द्वारा पूर्व में दी गई जानकारी के मुताबिक श्रीप्रकाश शुक्ला गोरखपुर में रहता था, जिसका गोरखपुर रेलवे का हेड क्वाटर था। यहाँ से जारी होने वाले टेंडर से बिहार में भी काम होता था। रेलवे के टेंडर को लेकर बड़े ग्रुप में काफी विवाद हुआ करते थे। इनमें एक तिवारी ग्रुप और दूसरा शाही ग्रुप था। बिहार के लोगों की भी रूचि इन टेंडर में रहती थी वो सोचते थे कि काम हमारे यहाँ का होता है, और टेंडर पूर्वांचल के माफिया डॉन ले लेते रहे। ऐसे में सूरजभान जो कि बाद में सांसद बने उनकी रूचि भी इन टेंडर की ओर आकर्षित हुई।  सूरजभान ने श्रीप्रकाश शुक्ला की मदद से इस टेंडर को हांसिल तो किया लेकिन उस दौरान  सहायता ली और उस दौरान टेंडर को बिहार से लेकर गोरखपुर और लखनऊ तक जमकर खून खराबा हुआ। उसमे मोड़ तब ज्यादा आया जब लखनऊ में श्रीप्रकाश शुक्ला ने वीरेंद्र शाही की हत्या कर दी। इसके आलावा भी उसने तमाम नामचीन लोगों की हत्या कर मौत की नींद सुला दिया था। उत्तर प्रदेश के साथ ही कई अन्य राज्यों में भी उसके नाम का डंका बजने लगा। ऐसे में यूपी पुलिस के लिए वह एक बड़ा सिर दर्द बन चुका था। कहीं ना कहीं प्रदेश में अपराध पर लगी लगाम की पैठ एकदम ढीली पड़ चुकी थी, ऐसे में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने एसटीएफ का गठन करने के लिए उस समय के एडीजी कानून व्यवस्था को अजयराज शर्मा को निर्देश दिए। जिसके बाद 4 मई 1998 को एसटीएफ का गठन हुआ। महानगर में एसटीएफ का एक छोटा से ऑफिस खोला गया।

एसटीएफ के गठन में इन अधिकारियों का रहा दबदबा

सबसे पहले तीन अधिकारी एसटीएफ में आए अरुण कुमार एसटीएफ के एसएसपी, सतेंद्रवीर सिंह एडिशनल एसपी और राजेश कुमार पांडेय डिप्टी एसपी बनाए गए इसके बाद एसटीएफ में फिर करीब एक दर्जन तेज तर्रार पुलिसकर्मी और शामिल हुए और आपरेशन श्रीप्रकाश शुरू हुआ। श्री प्रकाश का पता लगाने के लिए पहली बार उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रानिक सर्विलांस का सहारा लिया गया और 21 सितंबर 1998 को गाजियाबाद के इंद्रापुरम थाना क्षेत्र में श्रीप्रकाश शुक्ला और उसके दो साथियों को मुठभेड़ में एसटीएफ ने मार गिराया।

एसटीएफ के बड़े अभियान

एसटीएफ के नाम उपलब्धियों की एक लंबी फेहरिस्त है। माफियाओं, डकैतों को खत्म  करने से लेकर दर्जनों आतंकियों को गिरफ्तार करने के बाद यूपी एसटीएफ ने सभी को जेल भेजा। लेकिन, अब एसटीएफ की चुनौतियां काफी हद तक बड़ चुकी है। तेजी से बढ़ते कार्यक्षेत्र, काम के दबाव के सामने कम संख्याबल, कम सुविधाओं के कारण समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है। अधिकारियों की माने तो स्थिति ये है कि करीब डेढ़ हजार मामले एसटीएफ के पास है, जिनमें 200 से ज्यादा बड़े मामले शामिल है। उत्तर प्रदेश की विशेष इकाई के तौर पर एसटीएफ ने सभी चुनौतियों का सामना किया। एसटीएफ ने इस दौरान कई बड़े अपराधों का खुलासा किया। साथ ही कई बार अपराध होने से भी रोके।

1998 माफिया श्रीप्रकाश का एनकाउंटर

पट्रोल पंपों की मशीनों में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस लगाकर घटतौली का पर्दाफाश, जिसकी कार्रवाई अभी जारी है।

साल 2001 में जैसे मोहम्मद के तीन खूंखार आतंकवादियों को लखनऊ में मुठभेड़ के दौरान मार गिराया था।

साल 2005 में खूंखार आतंकवादी सलार को मुठभेड़ में मारा।

साल 2010 में 10 बड़े नक्सलियों की उनके लीडर के साथ गिरफ्तारी की।

साल 1998 में माफिया प्रकाश शुक्ला को मुठभेड़ में मार गिराया था।

साल 1998 कोलकाता में मनजीत सिंह उर्फ गंगे सरदार के साथ मुठभेड़,

साल 2008 में डुमरियागंज से भारी मात्रा में भारतीय जाली मुद्रा की बरामदी की गई।

साल 2006 में लखनऊ क्रिकेट एसोसिएशन के चेयरमैन ऑफ आयरन अपहृत खलीक मुख्तार की पटना से बरामदगी और अपहरणकर्ताओं की गिरफ्तारी।

साल 2015 में बिहार से अपहृत डॉक्टर दंपत्ति के अपहरणकर्ताओं की लखनऊ से गिरफ्तार।

साल 2006 में वर्ल्ड लाइफ अपराध के माफिया शब्बीर कुरैशी की गिरफ्तारी।

साल 2016 में एनआईए के डीवाईएसपी तंजील अहमद की हत्या का खुलासा, दो लाख के ईनामी अपराधी मुनीर अहमद की गिरफ्तारी।

साल 2017 में नोएडा पॉन्‍जी स्‍कैम का पर्दाफाश।

2020 बिकरू कांड के मुख्यारोपी विकास दुबे का एनकांउटर

लेखक

Madhvi Tanwar

Police Media News

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