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खाकी में कैसे धड़कता है दिल... IPS प्रवीण कुमार की ''वह एक और मन'' में की गई है बानगी

खाकी में कैसे धड़कता है दिल... IPS प्रवीण कुमार की ''वह एक और मन'' में की गई है बानगी

न दावा है और न दलील है, 
क्यों जिरह करके ज़लील है,
जैसा था सब सच रख दिया,
पक्तियां है पुलिलिया पेशे में अपने कार्यों में मसरूफ रहने वाले तेज तर्रार IPS अधिकारी प्रवीण कुमार की। जिनके तजुर्बे ही है जो उनके अभी तक के मिलों लंबे सफर के सच की बानगी करती है। शायद ही किसी के मन में सच को बंया करने की क़ुव्वत होती है। यहीं सच को बंया करा है आईपीएस प्रवीण कुमार ने। अभी मेरठ परिक्षेत्र में पुलिस महानिरीक्षक के पद पर तैनात प्रवीण कुमार इंजीनियरिंग ग्रेजुएट और क़ानून में परास्नातक हैं। BE और LLM की डिग्रिों के साथ-साथ उनकों उनके अलस जींदगी के तजुर्बों ने ही काफी ज्यादा सिखाया और पढ़ाया है। दरअसल आईपीएस अधिकारी के काव्य संग्रह की समीक्षा उत्तर प्रदेश एसटीएफ़ में डिप्टी एसपी के पद पर तैनात डॉ राकेश मिश्रा ने की है। जिनका लेखकीय नाम राकेश तूफ़ान है।

एक कवि की तरह मन सभी संवेदनाओं को किया पेश

दरअसल मेरठ आईजी प्रवीण कुमार ने उनके काव्य संग्रह में न केवल आम लोगों के सुख-दुःख के हालातों को बंया किया है। बल्कि उनके हालातों को भी समभाव के जरिए स्वीकार करने का साहस भी किया है। प्रवीण कुमार ने एक कवि की तरह मन में उमड़ती संवेदनाओं और अनुभूतियों को अपने काव्य संग्रह 'वह एक और मन' में मोतियों की तरह पिरोकर पेश किया है।

ये शायरी अदाकारी नहीं है लफ़्ज़ों की,
परत-दर-परत एहसास से पिरोना ज़रूरी है।

जैसे एक कवि को यह मालूम होता है कि दिल की गहराइयों से उपजी संवेदनाएं ही कविता की मूल जड़े होती है। लफ़्ज़ो के मोतियों को एक माला में पिरोते हुए शब्दों में बंया करना एक कवि के लिए जरूरी होता है। ऐसा ही उनकी कविता में जीवन की तमाम विसंगतियों के साथ-साथ आम इंसान के स्वर्णिम भविष्य की कामना और आगे आने वाले मंजरो को रुमानियत के साथ दार्शनिकता के साथ सभी के सामने पेश करना बेहद जरूरी है। 

कविता में है सुफिवादी फन

आईपीएस प्रवीण कुमार के काव्य संग्रह में जिस तरह से रुमानियत को उकेरा गया है उससे यह कहना गलत ना होगा कि उन्होनें कहीं ना कहीं अपने इस काव्य संग्रह में सुफिवादी फन को दिखाने का प्रयास किया है। दरअसल यह फन उस कवि के भीतर विद्यमान होता है जिसमें इन कविताओं में एक तरफ अपनों और अपनी तमाम ख़्वाहिशों से बिछड़ जाने की पीड़ा तो दूसरी तरफ तमाम सपनों को पूरा करने और दुनिया को बेहतर बनाने की ज़िद का जुनून होता है।

'मुझे चेतना अस्वीकार है' 

उनकी कविता की इस पक्ति में उदघोष के साथ इंकलाबी स्वर भी साफ झलकता है। अपने सपनों के पंख लिए उड़ान भरते हुए चाँद-सितारों के पार तक ले जाने की आज़ादी है मगर अपने भाग्य की ख़ुद पहरेदारी करने की बंदिशें भी हैं। जिसमें प्रेम, ज़िन्दगी, ख़्वाहिश, ख़्वाब, प्यास, नज़रिया, तसव्वुर, रात और हक़ीक़त जैसे रवायती मौज़ूआत से लेकर चिड़ियों की गुफ़्तगू, मौन, सोशल मीडिया, स्थानांतरण, अलाव, मुहांसे, कोविड और कोरोना तक पर रची कविताएं इस काव्य-संकलन का हिस्सा हैं। यहां वर्दी, ख़ाकी और लावारिस माल जैसे पुलिस विभाग के प्रचलित शब्दों और प्रतीकों पर भी भाव भरी पंक्तियां हैं। 

कुछ पंक्तियां देखें-

थाने के लावारिस मालों की तरह,
जाने-अनजाने, मालखाने के,
एक ऐसे वाहन में तब्दील हो हो गया हूं,
जिसका चेसिस नम्बर मिट गया है,
किसी मुआयने की तरह मुझे सिलसिलेवार करो,
वो लम्हें, जो फिसल के भागे हैं,
फिर से उन्हें गिरफ़्तार करो.
ऐसे में इस कविता के पाठक बनने के बाद यह कहना गलत है कि 'वह एक और मन' की कविताएं जीवन के विविध पक्षों के साथ तमामा गुफ़्तगू लिए एक काव्य संग्रह लिए दिखाई देती हैं और मनुष्य की सुप्त चेतनाओं को जगाती हुई नज़र आती हैं। इनमें सकारात्मक जीवन की पदचाप सुनी जा सकती है।

यही अहसास का तराशा हुआ नशेमन है,
यहीं उसकी ख़ामोश सदा रहती है.
आरोपियों को गिरफ्तार करने के साथ कानून व्यवस्था और शस्त्र की आज़माइश में दिन-रात गुज़ारने वाले बेहद ही वयस्त शख़्सियत  की क़लमो दवात से बिखरे ख़ूबसूरत काले मोतियों को अशआर अब आपके हवाले हैं। इस काव्य संकलन में कुल 112 कविताएं हैं।

पुस्तकः वह एक और मन
रचनाकारः प्रवीण कुमार
विधाः कविता
भाषाः हिंदी
प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन
मूल्यः 250 रुपए 

लेखक

Madhvi Tanwar

Police Media News

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