बुलंदशहर की स्याना तहसील में 2018 में हुई गोकशी के बाद भड़की हिंसा में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या और सार्वजनिक उपद्रव के मामले में अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। विशेष अदालत एडीजे-12 गोपालजी की कोर्ट ने बुधवार को अपने फैसले में 38 आरोपियों को दोषी करार दिया, जिनमें से पांच को आजीवन कारावास और बाकी 33 को सात-सात साल की सजा सुनाई गई है।
इनमें भाजपा से जुड़ा मंडल अध्यक्ष, एक जिला पंचायत सदस्य और एक ग्राम प्रधान जैसे प्रभावशाली नाम भी शामिल हैं, जिनकी भूमिका को अदालत ने गंभीर अपराधों की श्रेणी में माना है। यह फैसला साढ़े छह साल तक चले मुकदमे और साक्ष्यों के गहन परीक्षण के बाद सुनाया गया है।
कैसे भड़की थी हिंसा?
यह मामला 3 दिसंबर 2018 का है, जब स्याना क्षेत्र के महाव गांव में कथित गोवंश के अवशेष मिलने के बाद भीड़ उग्र हो गई थी। चिंगरावठी चौकी क्षेत्र में हिंसा के दौरान भीड़ ने पुलिस टीम पर हमला किया, जिसमें इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उसी दौरान चिंगरावठी के निवासी छात्र सुमित की भी मौत हो गई थी। मामले में 27 नामजद और दर्जनों अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ।
सिर्फ 26 गवाहों पर टिका पूरा मामला
जांच के दौरान गठित एसआईटी ने 126 गवाहों की सूची तैयार की थी, लेकिन अदालत में सिर्फ 26 गवाहों की गवाही हो सकी। इनमें घटनास्थल पर मौजूद पुलिसकर्मी, प्रशासनिक अधिकारी और चिकित्सक शामिल थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, सबसे अहम गवाह हरवानपुर निवासी मुकेश उर्फ मूला रहा, जिसने बताया कि प्रशांत नट ने पिस्टल छीनकर इंस्पेक्टर को गोली मारी थी, जबकि अन्य ने लाठी-डंडों से हमला किया।
गवाही का अंतिम चरण दिसंबर 2024 में पूरा हुआ, जब एसआईटी प्रभारी तत्कालीन सीओ राघवेंद्र मिश्रा ने कोर्ट में बयान दिया। इसी आधार पर अदालत ने सभी 38 अभियुक्तों को दोषी माना और सजा सुनाई।