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कारगिल विजय दिवस की 21वीं वर्षगांठ आज, जांबाजों ने खून से लिखी थी जीत की इबारत

कारगिल विजय दिवस की 21वीं वर्षगांठ आज, जांबाजों ने खून से लिखी थी जीत की इबारत

कारगिल को पाकिस्तानी घुसपैठियों से मुक्त कराने में अदम्य शौर्य, साहस व पराक्रम का परिचय देने वाले जांबाजों में राजधानी के नायकों का नाम गर्व से लिया जाता है। जांबाजों ने जान पर खेलकर मातृभूमि की रक्षा की। ऑपरेशन विजय परमवीर चक्र विजेता कैप्टन मनोज पांडेय की वीरता की कहानियों से भरा हुआ है, वहीं राइफलमैन सुनील जंग, मेजर रितेष शर्मा, लांसनायक केवलानंद द्विवेदी, कैप्टन आदित्य मिश्र, मेजर विवेक गुप्ता का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। इनके साहस पर सेना और देश को गर्व है। आज कारगिल विजय दिवस की 21वीं वर्षगांठ है। ऐसे में इन जांबाजों की वीरता व पराक्रम पर आधारित पेश है रिपोर्ट...

सामने मौत भी आ गई तो उसे खत्म कर दूंगा

कारगिल के हीरो कैप्टन मनोज पांडेय के नाम से शहर का नाम रोशन है। यूपी सैनिक स्कूल की वह शान रहे हैं। कारगिल युद्ध शुरू होने पर उन्हें मई, 1999 को कारगिल में भारतीय पोस्टों को खाली करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वह सेना में पांच नंबर प्लाटून का नेतृत्व कर रहे थे। बटालिक सेक्टर में दुश्मनों को खदेड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे। दुश्मनों के चार बंकरों को ध्वस्त भी कर दिया। इसी बीच दुश्मन की गोली से वह वीरगति को प्राप्त हो गए। कैप्टन मनोज पांडेय राजधानी के एकलौते ऐसे शहीद हैं, जिन्हें परमवीर चक्र प्रदान किया गया। गोमतीनगर में रहने वाले उनके पिता गोपीचंद पांडेय बताते हैं कि मनोज हमेशा हमेशा अपने पास मां का दिया रक्षा कवच पहना रहता था। उसका मानना था कि यह उसकी रक्षा करता है। वह हमेशा कहता था कि अगर अपनी बहादुरी साबित करने से पहले मेरे सामने मौत भी आ गई तो मैं उसे खत्म कर दूंगा। यह सौगंध है मेरी। पिता ने बताया कि जब मनोज गोरखा राइफल्स का हिस्सा बना तो दशहरे की पूजा के दौरान उससे अपनी दिलेरी साबित करने के लिए बलि के लिए एक बकरे का सिर काटने को कहा गया। एक क्षण के लिए तो मनोज थोड़ा विचलित हुए, लेकिन फिर उन्होंने फरसे का जबरदस्त वार करते हुए बकरे की गर्दन उड़ा दी। उनके चेहरे पर बकरे के खून के छींटे पड़े। बाद में अपने कमरे में उन्होंने कम से कम एक दर्जन बार अपने मुंह को धोया। मनोज पूरी उम्र शाकाहारी रहे।

बचपन में ही कर दी वर्दी की जिद

राइफलमैन सुनील जंग 1995 में सिर्फ  सोलह साल की उम्र में गोरखा राइफल्स में भर्ती होने वाले पहले शहीद थे। मई, 1999 को उन्हें कारगिल सेक्टर में पहुंचने का आदेश दिया गया। वह टुकड़ी के साथ कारगिल में आगे बढ़ रहे थे। तीन दिनों तक भीषण गोलीबारी हुई और इसी में वह वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी मां छावनी के तोपखाना में रहती हैं। मां बीना महत बताती हैं कि सुनील ने स्कूल की फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए सेना की वर्दी की जिद की थी। जब उन्होंने वर्दी दिलवा दी तो वह बंदूक की भी डिमांड करने लगा और उसे लेने के बाद ही स्टेज पर उतरा। सुनील ने अपने परिवार की परंपराओं का निर्वहन किया। उसके दादा मेजर नकुल जंग महत ने 1962 के चीन युद्ध में जांबाजी दिखाई थी। पिता पिता नर नारायण जंग ने गोरखा राइफल्स में शामिल होकर 1971 की लड़ाई में हिस्सा लिया था। जब वह रिटायर हुए तो सुनील सेना में पिता की रेजीमेंट में ही भर्ती हो गया। सुनील जंग कारगिल युद्ध में शहीद होने वाले राजधानी के पहले जांबाज थे। सुनील की बातें करते-करते मां की आंखें नम हो जाती हैं।

कारगिल से लौटकर सुनाईं वीरगाथाएं

मेजर रीतेश शर्मा का नाम उन जांबाजों में शामिल है, जो कारगिल युद्ध के बाद जब लौटे तो वीरता की गाथाएं लोगों को सुनाया करते थे। इंदिरानगर में रहने वाले उनके पिता सत्यप्रकाश शर्मा व मां दीपा शर्मा ने बताया कि रितेश की पढ़ाई लामार्टीनियर से हुई। इसके बाद वाराणसी में बीकॉम की पढ़ाई के लिए चले गए और वहीं से उनका चयन सीडीएस में हो गया। आईएमए में उन्हें नौशेरा कंपनी में रखा गया। इसके बाद दिसंबर, 1995 को सेना में भर्ती हुए। वह मध्य प्रदेश के महू से मोटार्र ट्रेनिंग के बाद 15 दिनों के लिए लखनऊ आए हुए थे कि उन्हें कारगिल में घुसपैठ की जानकारी मिली। छुट्टी निरस्त कर वह कारगिल पहुंच गए। यूनिट के साथ दुश्मनों से मोर्चा लेते हुए चोटियाें पर तिरंगा भी फहराया। इस वजह से ही 17 जाट रेजीमेंट को मश्कोह सेवियर का खिताब भी दिया गया। पिता सत्यप्रकाश शर्मा ने बताया कि कारगिल युद्ध के बाद 25 दिसम्बर, 1999 को कुपवाड़ा में आतंकी ऑपरेशन के दौरान वह खाईं में गिर गए, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां वह वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी स्मृति में स्कॉलरशिप व मेडल प्रदान किए जाते हैं। इंदिरानगर में जनकल्याण आंख अस्पताल में टॉपरों को गोल्ड मेडल, आरएलबी में हजार रुपये की छात्रवृत्ति भी दी जाती है। इतना ही नहीं उनकी याद में एक पार्क भी बनवाया गया है।

कैप्टन आदित्य मिश्र अक्सर यह बात

‘मां, मैं दुश्मनों को अपनी गोलियों से छलनी कर दूंगा। एक-एक बुलेट उनके शरीर में उतार दूंगा। लेकिन आखिरी बुलेट अपने लिए बचाकर रखूंगा’। कारगिल शहीद कैप्टन आदित्य मिश्र अक्सर यह बात अपनी मां से कहते थे। वह चंद्रशेखर आजाद के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थे। उनके पिता जीएस मिश्र वरिष्ठ सैन्य अधिकारी रहे हैं। शहीदों के परिजनों के लिए काम करने वाले समाजसेवी विनीय चतुर्वेदी बताते हैं कि राजधानी के कैथेड्रल स्कूल से उन्होंने पढ़ाई की और इसी दौरान उनमें देशप्रेम का जज्बा पैदा हो गया। जून, 1996 को सेना के सिग्नल कोर में आदित्य मिश्र सेकेंड लेफ्टिनेंट पर भर्ती हुए थे। जहां से उन्हें वर्ष 1999 में लद्दाख स्काउट में तैनाती मिली। कारगिल में जब युद्ध छिड़ा तो उन्हें बटालिक भेजा गया। जहां 17 हजार फीट की ऊंचाई पर हिंदुस्तानी पोस्ट से पाकिस्तानियों को खदेड़ने के लिए धावा बोल दिया और राइफलमैन सुनील जंग व लांसनायक केवलानंद द्विवेदी के साथ मिलकर दुश्मनों को धूल चटा दी। दुश्मनों को निपटाने के बाद जब वह नीचे आए और पोस्ट पर कम्युनिकेशन के लिए तार बिछाने दोबारा गए तो वहां फिर से दुश्मन आ चुके थे। उन्होंने दोबारा मोर्चा लिया और पोस्ट खाली करवाई। लेकिन तार बिछाते वक्त वह घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुए।

लेकिन शहादत के बाद मिली चिट्ठी

मेजर विवेक गुप्ता का नाम कारगिल के उन हीरोज में शामिल है, जिनके बहादुरी के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं। शहीदों के परिजनों के हक की लड़ाई लड़ने वाले सौमित्र त्रिपाठी बताते हैं कि मेजर विवेक गुप्ता 2 राजपूताना राइफल्स में थे। उन्होंने नेशनल डिफेंस एकेडमी से स्नातक किया। वहां से निकलने के बाद एक बार उन्होंने पिता से कहा था कि वह सेना में मोजे व ट्राउजर गिनने के लिए नहीं हैं। यह बात उस वक्त कही गई थी, जब उन्हें पीस एरिया यानी सुरक्षित पोस्टिंग दिलाने की चर्चा की जा रही थी। कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें छह साथियों के साथ तोलोलिंग भेजा गया। वह मई में घर पर आए थे और युद्ध की सूचना मिलते ही तत्काल लौट गए। उन्होंने दो मुश्किल चोटियों को फतह किया और युद्ध के दौरान ही वीरगति को प्राप्त हुए। उन्होंने अपने पिता को एक पत्र भी लिखा था, जिसमें कहा था कि आपको मुझ पर गर्व होगा। लेकिन यह पत्र उनके पिता को उस वक्त मिला, जब सेना उनके बेटे को सलामी दे रही थी।

लांसनायक केवलानंद द्विवेदी

जब कारगिल छिड़ा तो उस दौरान लांसनायक केवलानंद द्विवेदी की पत्नी बीमार थी। जैसे ही उन्हें सूचना मिली, वह बीमार पत्नी को छोड़कर मातृभूमि की रक्षा के लिए चले गए। वह अपनी पत्नी से कहते भी थे कि मातृभूमि की रक्षा के लिए उनका एक भी पग पीछे नहीं हटेगा। उनका जन्म जून, 1988 को पिथौरागढ़ में हुआ था। उनके पिता ब्रह्मदत्त द्विवेदी सेना में सूबेदार थे। लखनऊ में उनका परिवार एल्डिको रायबरेली रोड पर रहता है। बड़े बेटे हेमचंद ने प्रबंधन की पढ़ाई की है और छोटे बेटे तीरथ ने कम्प्यूटर की पढ़ाई। लांसनायक केवलानंद द्विवेदी कारगिल सेक्टर में दुश्मनों को निपटाते हुए लगातार आगे बढ़ रहे थे। इसी बीच ऊंचाई पर बैठे दुश्मन की एक गोली उन्हें आकर लगी और वे वीरगति को प्राप्त हो गए। उनकी शहादत की खबर सुनकर परिवार टूट गया। मां बीमार पड़ गई। अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती करवाया गया, लेकिन वह चल बसीं। परिजन बताते हैं कि जब उनकी शादी हुई थी तो वह केवल 22 साल के थे और पत्नी 20 साल की थीं। शादी के बाद केवल चार से पांच बार ही घर पहुंच पाए थे। ऐसे में पत्नी ने बहुत ही संघर्ष कर बच्चों को पढ़ाया व एक मुकाम तक पहुंचाया।

लेखक

Sandhya mishra

Police Media News

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