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लखनऊ के विवेक हत्याकांड पर पढ़िये यूपी पुलिस के डीएसपी के विचार

लखनऊ के विवेक हत्याकांड पर पढ़िये यूपी पुलिस के डीएसपी के विचार

​मैं पुलिस में हूं और इस वजह से पुलिस पर लगे हर आरोप को मैं स्वयं पर लगा आरोप मानता हूं चाहे वह रिश्वतखोरी हो बेईमानी हो फ़र्ज़ी मुकदमे लिखना हो या फ़र्ज़ी एनकाउंटर करना हो! हर पुलिसकर्मी को यह व्यक्तिगत अनुभव होगा कि उसकी पहचान उसके गलत कार्यों से ही ज्यादा की जाती है बनिस्बत उसके अच्छे कार्यो से!और कई बार समाज भी उसी पुलिस को बेहतर मानती है जिसका धौंस हो जिससे लोग डरते हो या फिर विभाग भी उसकी तवज्जो इसलिए देती है क्योंकि पुलिस को समाज के सबसे गन्दे या शातिर तबके को नियंत्रित करना होता है।जिसके लिए या तो पुलिस विभाग के पास उतना संसाधन हो या फिर उसे उन सीमित संसाधनों में से ऐसे लोगों का चुनाव करना होता है जो किसी भी तरह उन कार्यों को कर सके!

लेकिन इन सबके बीच जो सबसे बड़ा गैप क्रिएट होता है वह यह कि एक पुलिसकर्मी अपने नागरिक होने के बोध से दूर हटता चला जाता है!लोकतंत्र में किसी भी महत्वपूर्ण पोजिशन पर बैठे हुए व्यक्ति को अपने नागरिक होने का बोध होना जरूरी है, नही तो फिर समाज को उसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है।
लखनऊ में जो घटना हुई वह भी इसी का दुष्परिणाम है।वर्दी एक अजीब ताकत देती है जिसको सम्हालना बड़ी मुश्किल काम है।सेल्फ डिफेंस के लिए गोली चला देना सही है या गलत यह अब विवेचना से तय होगा लेकिन नागरिक बोध से देखें तो यह पचने योग्य नही।सबसे पहले तो जरूरी है कि आप अपनी जान बचाइए उसके लिए जरूरी नही कि गोली ही चलाए।करना तो यह चाहिए था कि उक्त गाड़ी की सूचना कंट्रोल रूम को दी जाती और आगे कि थाने-चौकी या पिकेट की मदद से उनको पकड़ा जाता या फिर नही भी पकड़ा जाता तो उस गाड़ी न से उस व्यक्ति तक पहुंचा जाता!

खैर इस समय तमाम पुलिसकर्मी साथी पुलिस के बचाव में है और उन्हें मेरी बात बुरी लग सकती है तो मैं यह फिर बता दूं कि पुलिसकर्मी से इतर मैं और आप एक सामान्य नागरिक भी हैं।यह भ्रम पालना कि दुनिया मे मैं ही मैं हूं या देश की सारी जिम्मेदारी हमारे ही कंधों पर है हमे एक अहंकारी, अतार्किक और नासमझ इंसान बनाती है।जरूरत है कि हम अपने पुलिस और नागरिक दोनों के होने के बोध को समझे!
और सच कहूं तो पुलिस को इस तरह के भ्रम में जीने के लिए इस व्यवस्था ने तैयार किया है।यह व्यवस्था चाहती है कि पुलिस को कम संसाधनों में रखा जाए ताकि काम के तनाव और तमाम तरह की परेशानी में फांसकर उससे अपनी मनमानी कराई जा सके!पुलिस को राजनीतिज्ञ अपनी कठपुतली बना कर रखना ही चाहते हैं तभी तो पुलिस विभाग में संसाधनों की कमी पर वह मौन बने रहते हैं।

अगर आपको याद हो तो पिछले कुछ दिनों में एक आईपीएस, एक एएसपी और कई दरोगा तथा कांस्टेबल ने आत्महत्याएं की।राजनीतिक नफा नुकसान को छोड़ दिया जाए तो कितने लोगों ने पुलिस के कार्यप्रणाली और उनकी समस्याओं के बारे में आगे पहल करने की सोची!आईपीएस की छोड़ दे तो किसी और के मरने पर तो यहां कोई फर्क ही नही पड़ता!एक पुलिस वाला मर जाए तो क्या ही नुकसान हो जाता है!

आज कई मीडिया समूह द्वारा पुलिसकर्मियों द्वारा अपने साथी पुलिस के लिए पैसे इकट्ठा करने पर हाय तौबा मचाई जा रही है, खैर हाय तौबा तो मचेगा ही लेकिन जो समाज के ज़िम्मेदार तबका है उनसे मैं यह कहना चाहता हूँ कि आप इसकी जड़ में जाइए और यह ढुढिये कि ऐसी नौबत ही क्यो आती है?

सच मानिए एक सामान्य पुलिस की बात रखने वाला ऊपर कोई नही है!कोई नही है जो उसके सुख-सुविधा के लिए ऊपर बात करें या फिर उसकी समस्याओं के लिए।ऊपर के गैर जिम्मेदाराना रवैये का यह परिणाम है कि   अनुशासित फोर्स के जवान को मीडिया में आना पड़ता है।
अंत मे विवेक तिवारी और गोली चलाने वाला पुलिसकर्मी दोनों ही अपने हैं।हमें इनका पैरोकार नही बनना बल्कि सच की जरूरतमंद की पैरवी करनी होगी।अपनी लड़ाई तो यही है भाई!

( डीएसपी अभिषेक प्रकाश के एफबी वॉल से )

मुख्य संवाददाता

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