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पिता की मौत का बदला लेने के लिए उठाए थे हथियार... अब 14 साल जेल में सजा काटकर बाहर आया बाहुबली डॉन बृजेश सिंह

पिता की मौत का बदला लेने के लिए उठाए थे हथियार... अब 14 साल जेल में सजा काटकर बाहर आया बाहुबली डॉन बृजेश सिंह

आखिरकाल 14 साल जेल की सजा काटने के बाद रिहा हो गया डॉन बृजेश सिंह.... मुख्तार अंसारी का जानी दुश्मन और जरायम की दुनिया में अपने नाम का परचम लहराने वाले जिस बृजेश सिंह को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सल ने साल  2008 में ओडिशा के भुवनेश्वर से गिरफ्तार किया था। आखिरकार इस बृजेश सिंह को हाईकोर्ट ने जमानत देकर रिहा कर दिया है। देखा जाए तो वास्तव में साल 1986 से 2022 तक तकरीबन 36 साल बृजेश सिंह की जिंदगी कानून के साए में कैद रही। 

कई माफियाओं की उड़ गई नींद 

डॉन बृजेश सिंह की बाज की जाए तो उसकी जिंदगी की किताब के पन्ने में यह 36 साल सामान्य नही है। माफिया डॉन बृजेश सिंह (Brijesh Singh) को 14 साल जेल में रहने के बाद आखिरकार जमानत पर रिहाई मिल गई है। बृजेश को गाजीपुर के उसरी चट्टी कांड में हाई कोर्ट की सिंगल बेंच से राहत मिली है। साल 2001 में तत्कालीन मऊ विधायक माफिया मुख्तार अंसारी (Mukhtar Ansari) के काफिले पर हमले के आरोप में बृजेश सिंह जेल में बंद हैं। अब जब डॉन बृजेश सिंह जेल से बाहर आ चुका है, तो कई माफियाओं की रातों की नींद और दिन का चेन खो चुका है। तो किसी के गले से खाने का नीवाला तक नहीं उतर रहा है। एक आलीशन घर में आने के अब बृजेश सिंह सामान्य जिंदगी जिएगा। भले ही बृजेश सिंह जेल में रहा हो लेकिन वाराणसी एमएलसी सीट पर उसके परिवार की हुकूमत आज भी बरकरार है। मौजूदा समय में उनकी पत्नी अन्नपूर्णा सिंह यहां कि सीट से एमएलसी हैं। 

पिता की मौत का बदला लेने के लिए उठाए थे हथियार

जीवन में 36 साल सामान्य जिंदगी से दूर रहकर बृजेश सिंह ने 14 साल जेल में बिताए है। दरअसल 1986 में जिस समय बृजेश सिंह ने अपराध की दुनिया में कदम रखा था उस समय चंदौली जिले का बलुआ इलाका वाराणसी में आता था। वाराणसी के धरहरा गांव के रहने वाले बृजेश सिंह का नाम 1984 में पहली बार हत्या मामले में तब जुड़ा जब पिता की हत्या का बदला लेने के लिए उसने हथियार उठाया और अपने पिता के कथित हत्यारे को मौत के घाट उतारा। इसके बाद वह फरार हो गया और उन लोगों की तलाश करने लगा जो उसकी पिता की हत्या में शामिल थे। 

साल 1987 में 7 लोगों को मौत की नींद सुलाया

इसी दौरान बलुआ के सिकरौरा गांव में 9 अप्रैल 1986 की देर रात गांव के पूर्व प्रधान रामचंद्र यादव व परिवार के 7 लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया था। घटनास्थल से कुछ ही दूरी पर बृजेश सिंह पैर में गोली लगने के कारण घायल पड़ा हुआ था। इसके बाद डॉन बृजेश सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार तो कर लिया था लेकिन बाद में उसकी जमानत भी हो गई थी। बस वह दिन था जब सभी ने बृजेश सिंह को आखिरी बार देखा, क्योंकि उसके बाद बृजेश सिंह का नाम तो सुना लेकिन किसी ने देखा नहीं। 

जेल में रहते बनाई अलग पहचान

जिस समय बृजेश सिंह जेल में था उस समय बृजेश की पहचान कई अपराधियों के साथ हुई थी। क्राइम की दुनिया का वह बेताज बादशाह जेल में रहते हुए ही बन चुका था। इसी दौरान उसका धंधा फलने- फूलने लगा। साल 1996 में बृजेश के निशाने पर मुख्तार अंसारी आ गया। दोनों में एक दूसरे के नाम को दबाने की जंग छिड़ गई। पूर्वांचल में दोनों के गुटों में कई बार गैंगवार हुआ। जिससे जुड़ी कई घटनाएं भी सामने आई। 

यूपी सरकार ने घोषित किया था 5 लाख का ईनाम

साल 2000 में काफी समय से फरार चल रहे बृजेश सिंह पर यूपी पुलिस ने 5 लाख रुपए का इनाम भी घोषित किया था। 2003 में कोयला माफिया सूर्यदेव सिंह के बेटे राजीव रंजन सिंह के अपहरण और हत्याकांड में मास्टरमाइंड के तौर पर बृजेश का नाम आया। 

माफिया मुख्तार के काफिले पर किया था हमला

साल 2001 में 15 जुलाई को गाजीपुर के उसरीचट्टी गांव में मुख्तार अंसारी के काफिले पर हमला हुआ था जिसमें बृजेश सिंह के नाम की गुंज उठी। इसी मामले में कोर्ट ने उसे अब जाकर जमानत दी है। इसके साथ ही साल 2004 में लखनऊ के कैंट सदर थाना क्षेत्र के रेलवे क्रॉसिंग के पास मुख्तार अंसारी गैंग से गैंगवार और गोलीबारी में एक बार फिर से बृजेश सिंह का नाम अखबारों की काली सुर्खियों के साथ छपा। जिसके बाद फिल से 4 साल का सन्नाटा उस समय टूटा था, जब साल 2008 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने ओडिशा के भुवनेश्वर में अरुण कुमार सिंह बनकर छिपे हुए बृजेश सिंह को धर दबोचा था। देखा जाए तो साल 1986 से साल 2022 तक 36 साल बृजेश सिंह की जिंदगी कानून के साए में कैद रही।

लेखक

Madhvi Tanwar

Police Media News

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